बहुत दिनों से मैं सोच रहा था कि कोई तो ऐसा कार्यक्रम आए जो इन एकता कपूर के धारावाहिकों से मुक्ति दिलवाए । कहते हैं कि ईश्वर से सच्चे दिल से जो कुछ भी मांगों वो मिल जाता है और हुआ भी आखिरकार आईपीएल के रोमांच के आगे एकता कपूर के लिजलिजे पात्रों ने दम तोड़ ही दिया और आई पी एल ने अपने आप को स्थापित कर लिये हालंकि ये कुछ ही दिन के लिये हुआ हे पर मैं तो अपनी कह रहा हूं कि मेरे घर में ऐसा शायद कई सालों बाद हो रहा है कि महिलाएं अब कुछ घर के काम पर भी रात के समय ध्यान दे रहीं हैं । अब रात को मुझे गर्म खाना मिलने लगा है । मनुहार कर कर के खाना खिलाया जा रहा है कि एक तो और लो कितने दुबले हो गए हो । ऐसा इसलिये क्योंकि टीवी पर बच्चों ने कब्जा कर लिया है । पहले तो ये होता था कि आखिरकार बच्चे हार जाते थे पर इस आई पी एल ने तो खेल ही बदल दिया है । एक तो ये कि बच्चों की छुट्टियां चल रहीं हैं और दूसरे आईपीएल का रोमांच दोनों ने एकता कपूर की तुलसी पार्वती और अजीब अजीब सी शक्लों वाली खलनायिकाओं की धुलाई कर दी है । कभी तो होना ही था तो अब हो गया है । अब कुछ लोग कह रहे हैं कि ये तो तात्कालिक रूप से हो रहा है आईपीएल जाने के बाद क्या होगा । तो मेरा कहना ये है कि ठीक है ये तात्कालिक रूप से हो रहा है पर हुआ तो है । और एक बात जो मुझे अच्छी लग रही है इन मैचों में वो ये कि टेंशन नहीं है केवल उल्लास है । पहले मैंचों को देखने में भारत के हार जाने का टेंशन ( जो अक्सर होता भी था ) लगा रहता का पर अब तो कोई नृप होए हमें क्या हानि वाली बात है । अपन तो देखते रहो । कोई भी जीते या हारे अपने को क्या फर्क पड़ता है । मतलब ये कि दिन भर आफिस में सर खपाने के बाद जब घर लौटो तो तुलसी का और पार्वती का टेंशन या फिर ये कि आखिरकार ये पत्नी है किसकी अनुराग बसु की या मिसटर बजाज की । और फिर ये कि आखिरकार ये जो बच्चा है ये है किसका पार्वती और ओम का या पार्वती और उसके दूसरे पति का या ओम और उसकी दूसरी पत्नी का । मुझे तो कभी कभी लगता है कि एकता कपूर के बारे में भी ..................... । खैर और उस पर ये कि वो कौन सी दवा है जिसको खाने के बाद पार्वती जब बीस साल बाद लौटती है तो पहले से ज्यादा जवान हो जाती है ( ये सब बातें उन अनुभवों के आधार पर कह रहा हूं जो खाना खाने के दौरान सामने चल रहे टीवी को जबरन देखने के दौरान मिले हैं ।) एक बात बता दूं मैं अपने समय में अपने शहर की क्रिकेट टीम का कप्तान रह चुका हूं और क्रिकेट का दीवाना रहा हूं पर काफी समय से क्रिकेट देखना बंद कर दिया था कारण ये था कि मैं भारत को हारते हुए देख नहीं पाता था । दूसरे ये कि पूरा दिन भर अब क्रिकेट पर खराब करने की उम्र भी नहीं रही । इसीलिये मैं इस 20;20 का समर्थक हुं जितना समय एक फिल्म देखने में लगता है उतना समय क्रिकेट में लगाओ और निकल लो । और आईपीएल तो इसलिये भी अच्छी है क्योंकि वहां पर तो केवल खेल देखना है जीत हार का तो कोई टेंशन ही नहीं है । और एक बात ये भी कि अलग अलग देशों के खिलाड़ी जब एक ही टीम में खेलेंगे तो मैत्री की भावना मजबूत होगी ही । खैर मैं प्रसन्न हूं और एकता कपूर की इस पहली हार पर दिल से प्रसन्न हूं । अंत में एक बात सच बताइये जब आप दिन भर के थके हारे घर लौटते हैं तो क्या चाहते हैं यही ना कि कुछ ऐसा देखें जो दिन भर के तनाव को दूर कर दे और उसमें सब आता है आपके बच्चों की मुस्कुराहट भी कोई अच्छी हास्य फिल्म भी और आईपीएल भी, मगर एकता कपूर ना बाबा ना ..............।
Wednesday, May 7, 2008
Friday, May 2, 2008
मध्य प्रदेश सरकार को योजनाओं के प्रचार के लिये लेना पड़ रहा है मुन्ना भाई का सहारा
वैसे भले ही सब ये कहते हैं कि सिनेमा एक दोयम दर्जे की चीज है पर हकीकत ये है कि उसका सहारा सभी को लेना ही पड़ता है अब मध्य प्रदेश की सरकार को ही ले लें जब उसको अपनी योजनाओं के प्रचार की ज़रूरत पड़ी ( चुनाव जो आ गए हैं ) तो उसको भी सबसे पहले याद आई मुन्ना भाई की ही । सरकार ने अपनी योजनाओं के प्रचार के लिये विकास रथ बनाएं हैं जों कि गांव गांव में घूम कर सरकार की योजनाओं की जानकारी दे रहे हैं । अब इसमें भी ख़ास बात ये है कि योजनाओं की जानकारी तो बाद में दी जाती है पहले तो गांव वालों को एकत्र करने के लिये प्रोजेक्टर पर मुन्ना भाई एमबीबीएस, लगे रहो मुन्ना भाई जैसी फिल्में दिखाई जाती हैं । और ऐसा भी नहीं है कि ये योजना में शामिल नहीं है ये भी बाकायदा योजना में शामिल है कि गांव वालों को पहले ये फिल्में दिखाई जाएंगीं और बीच बीच में विज्ञापन के ब्रेक की तरह योजनाओं का प्रचार किया जाता है । मतलब ये कि अब सरकारें भी टीवी वालों की तरह हो गईं हैं । प्रचार करना है तो फिल्में दिखाओ और बीच बीच में अपना विज्ञापन कर लो । मजे की बात ये है कि फिल्में दिखाई जाएंगी ऐसा कहा गया है सरकार के प्रचार तंत्र जिला जनसंपर्क द्वारा जारी की गई विज्ञप्ति में कि सरकारी योजनाओं के प्रचार प्रसार के लिये जो योजना विकास रथ गांव गांव में जा रहा है उसमें मुन्ना भाई सीरिज की फिल्में दिखाई जाएंगीं । सही बात भी है अगर आपकी योजनाओं में दम है तो प्रचार खुद ही हो जाता है पर अगर दम ना हो तो फिर तो मुन्ना भाई का सहारा लेना ही पड़ता है ।
Tuesday, February 26, 2008
सुकवि मोहन राय स्मृति गीतांजली समारोह संपन्न प्रो. डॉ. भागचन्द जैन को शिवना सारस्वत सम्मान प्रदान किया गया
सीहोर शहर की अग्रणी साहित्यिक प्रकाशन संस्था शिवना प्रकाशन ने सुकवि मोहन राय की प्रथम पुण्य तिथि पर गीतांजली समारोह का आयोजन कर उनको अपनी श्रध्दांजलि अर्पित की । इस अवसर पर शिक्षाविद् प्रो. डॉ. भागचन्द जी जैन को शिवना सारस्वत सम्मान से समादृत किया गया ।
सुकवि मोहन राय की प्रथम पुण्यतिथि पर शहर के साहित्यकारों तथा बुध्दिजीवियों ने शिवना प्रकाशन के आयोजन में उनको अपनी श्रध्दांजलि अर्पित की । कार्यक्रम का अध्यक्षता पूर्व विधायक श्री शंकरलाल जी साबू ने की जबकि मुख्य अतिथि के रूप में मुम्बई से पधारे श्री केशव राय उपस्थित थे । विशेष अतिथि के रूप में सारणी से पधारे गीतकार श्री सजल मालवीय और सहकारी बैंक के प्रबंधक श्री अजय चंगी उपस्थित थे तथा कार्यक्रम के सूत्रधार शिवना प्रकाशन के प्रकाशक पंकज सुबीर थे । कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथियों ने तथा मां सरस्वती तथा सुकवि श्री राय के चित्र पर माल्यर्पण कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया । युवा कवि जोरावर सिंह ने मां सरस्वती की वंदना का सस्वर पाठ किया । शिवना की ओर से डॉ. कैलाश गुरू स्वामी, बृजेश शर्मा, अनिल राय ने पुष्प हारों से तथा ओम राय ने बैज लगाकर अतिथियों का स्वागत किया । वरिष्ठ कवि श्री रमेश हठीला तथा हरीओम शर्मा दाऊ ने स्व. श्री राय के गीतों का सस्वर पाठ करे उनको गीतांजलि अर्पित की। तत्पश्चात शिवना प्रकाशन की ओर से दिया जाने वाला सुकवि मोहन राय स्मृति शिवना सारस्वत सम्मान कन्या महा विद्यालय के प्राचार्य तथा शहर के वरिष्ठ शिक्षाविद् प्रो. डॉ. भागचन्द जी जैन को दिया गया । अतिथियों ने शाल श्रीफल तथा सम्मान पत्र भेंट कर श्री जैन को ये सम्मान प्रदान किया । इस अवसर पर बोलते हुए श्री केशव राय ने कहा कि धन्यवाद के पात्र होते हैं वे लोग जो किसी साहित्यकार को उसके जाने के बाद भी इतनी शिद्दत के साथ याद करते हैं । प्रो. डॉ. भागचन्द जैन ने सीहोर के साथ अपने अट्ठाईस साल पुराने रिश्तों का जिक्र करते हुए कहा कि इतने वर्षों में इस शहर ने मुझे इतना कुछ दिया है कि मुझे कभी भी अपने गृह नगर सागर लौट कर वापस जाने का विचार भी नहीं आया । उन्होंने सीहोर की साहित्यिक चेतना की भी प्रशंसा की । कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पूर्व विधायक श्री शंकरलाल साबू ने कहा कि मोहन राय के साथ पूरे शहर के लोगों को नेह का नाता था सभी के साथ उनके आत्मीय संबंध थे । सुकवि मोहन राय अपनी कविताओं अपने साहित्य के कारण हमेशा हमारे दिलों में रहेंगें वे कभी हमसे जुदा नहीं हो पाएंगें । सजल राय ने मोहन राय को गीतों का राजकुमार निरूपित करते हुए उनको गीतों के माध्यम से अपनी श्रध्दांजलि अर्पित की । अंत में आभार व्यक्त करते हुए डॉ. मोहम्मद आजम ने सभी को आभार व्यक्त किया । कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शहर के पत्रकार, साहित्यकार, सुधि श्रोता उपस्थित थे ।
Thursday, January 10, 2008
मुख्यमंत्री के क्षेत्र के एक गांव के पूरे ग्रामीणों ने रखा उपवास, बच्चों ने नहीं लगाया मिड डे मील को हाथ
चार साल पहले प्रदेश में बिजली पानी और सड़क को लेकर बनी सरकार की हालत क्या है ये बात इसी से पता चल जाती है कि मुख्यमंत्री के क्षेत्र में पड़ने वाले एक गांव के ग्रामीण उन्हीं को सदबुद्धि देने के लिये उपवास कर रहै हैं और वो भी एक सड़क को लकर ही ।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के विधानसभा क्षेत्र बुदनी के रेहटी के समीप के गांव मांजरकुई के ग्रामीणो ने उपवास रखा और आमरण अनशन प्रारंभ कर दिया है । उपवास की स्थिति ये थी कि पूरे गांव में किसी भी घर में चूल्हा नहीं जला और तो और स्कूल जाने वाले बच्चों ने भी उपवास में अपने माता पिता का साथ दिया । इस प्रकार से कि उन्होंने स्कूल में बनने वाले मिड डे मील को हाथ भी नहीं लगाया और पूरा का पूरा खाना शाम तक वैसा ही पड़ा रहा । दरअस्ल में गांव को लेकर मुख्यमंत्री ने कई बार सड़क निर्माण की घोषण कर दी है पर ग्रामीणों का कहना है कि घोषणा के वल घोष्णा ही रहती है और अभी तक तो कोई भी कार्यवाही नहीं हो पाई है । और अब चुनाव का साल भी आ गया पर कुछ नहीं हो पाया । बार बार मुख्यमंत्री के पास फरियाद लगाते लगाते ग्रामीण थक गए तो आखिरकार उन्होंनें । उपवास का रास्ता अपनाया । पूर्व घोषणा के अनुसार गुरूवार से ये ग्रामीण अनशन पर बैठ गए । पहले दिन पूरा गांव जुट गया और पूरे के पूरे गांव ने ही उपवास रखा । और उसके साथ दो लोग अनशन पर बैठ गए तथा पांच लोगों ने भूख हड़ताल प्रारंभ करदी है । 65 साल के बाबूलाल अनशन पर बैठे हैं । एक दिन पहले ही मुख्यमंत्री ने सड़क टारगेट अधूरा रहने को लेकर अधिकारियों का फटकार लगाई है और लगाएं भी क्यों न जब स्थिति ये बन रही हो कि उनके ही क्षेत्र की जनता को सड़क के लिये अमरण अनशन करना पड़ रहा हो तो पूरे प्रदेश ही हालत क्या होगी अनुमान लगाया जो सकता है
Sunday, December 9, 2007
रेडियो मास्टर साहब की कक्षा में सीख रहे हैं स्कूल के बच्चे अंग्रेजी बोलना
एक साल पहले रेडियो के द्वारा सरकारी स्कूलों में बच्चों को अंग्रेजी सिखाने का प्रयास की शुरूआत की गई थी हालंकि उस समय तो इसको गंभीरता से नहीं लिये गया था पर आज उसके परिणाम सामने आने लगे हैं । मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के स्वामी विवेकानंद स्कूल में सुबह दस बजे छात्रों के समूह को रेडियो के सामने बिठाकर उनको अंग्रेजी सीखने का प्रोग्राम सुनाया जाता है उसी समय ये बच्चे रेडियो पर बोले गए वाक्यों को साथ में दोहराते हैं और कार्यक्रम खत्म होने के बाद सीखे गए वाक्यों को दोहराते हैं । इस अभ्यास से बच्चों को काफी फायदा मिल रहा है और अब ये बच्चे अंग्रेजी में दक्ष होते जा रहे हैं । अब ये बच्चे अंग्रेजी के वाक्यों को बहुत अच्छी तरह से बोल लेते हैं । विवेकानंद स्कूल के टीचर बताते हैं कि रेडियो को सुनते सुनते ये बच्चे आसानी से अंग्रेजी सीख रहे हैं और ये प्रोग्राम भी इतना मनोरंजक होता है । कि बच्चे इसे कभी भी छोड़ना नहीं चाहते हैं । वहीं बच्चों को कहना है कि रेडियो प्रोग्राम सुनते हुए सीखना उनको अच्छा लगता है उसमें ना तो डांट होती हे और नही कुछ कठिन शब्द होते हैं । पिछले साल चालू की गई इस योजना को अभी तो कक्षा छ: से शुरू किया जाता है पर आने वाले साल में इसको कक्षा पहली से ही प्रारंभ किया जाएगा । कक्षाओं का दृष्य बड़ा मज़ेदार होात है कक्षा टीचर की टेबल पर रेडियो मास्टर साहब को बिठाया जाता है और कक्षा टीचर पीछे खड़े होते हैं और फिर चालू होती है रेडियो गुरूजी की कक्षा । अच्छा प्रयोग है पर ये तो बड़ी मुश्किल है कि आने वाले टीचर्स डे पर ये बच्चे किसको फूल भेंट करेंगें टीचर को या रेडियो को ।
Wednesday, December 5, 2007
भारत के प्रधानमंत्री का नाम बाबूलाल गौर है
चौंकिये मत ये एक बात ही वो हें जो देश में शिक्षा के नाम पर करोंड़ों के खर्चे की सारी कलई खोल कर रख देती है । और इससे ही पता चलता है कि वास्तव में हम तो जहां से चले थे वहीं पर खड़े हैं और बड़े बड़े अभियानों से कुछ भी नहीं बदल पाया है ।
दरअसल में ये बात कही है एक स्कूली छात्र ने जिसको शिक्षा विभाग ने बड़े शान का साथ प्रश्न पूछने के लिये कलेक्टर के सामने प्रस्तुत किया था । मध्यप्रदेश सरकार द्वारा कलेक्टरों के गांव में रात्रि विश्राम की योजना चलाई जा रही है और इसके तहत ही प्रदेश के सीहोर जिले के कलेक्टर ग्राम कठोटिया में रात्रि विश्राम के लिये पहुंचे । वहां पहुंचनें के बाद उन्होंनें ग्राम वासियों की समस्याओं की जानकारी ली और उसके बाद जिला शिक्षा अधिकारी ने सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों के कलेक्टर के सामने प्रस्तुत कर दिया । कलेक्टर राघवेंद्र सिंह ने उनसे समान्य ज्ञान के प्रश्न पूछने प्रारंभ कर दिये और बहुत ही शीघ्र जिला शिक्षा अधिकारी को लग गया कि उन्होंने एक बड़ी ग़लती कर दी है क्योंकि बच्चे बहुत ही मजेदार उत्तर दे रहे थे । कलेक्टर ने पूछा कि बच्चों बताओं गंगा कहां से निकलती है बच्चों ने कुछ देर सोचा और फिर उत्तर दिया ' सर गंगा नदी में से निकलती है '' । संभवत: बच्चे गंगा का मतलब किसी लड़की या महिला से समझे होंगें जिसको उन्होंने नदी में से निकलते देखा होगा । सबसे मज़ेदार उत्तर कलेक्टर को मिला इस प्रश्न पर कि बताओं भारत का प्रधानमंत्री कौन है । बच्चों ने तपाक से उत्तर दिया '' बाबूलाल गौर'' । कलेक्टर और शिक्षा अधिकारी सब उत्तर से हतप्रभ रह गए । और तुरंत ही शिक्षक पर कार्यवाही करने के निर्देश जारी कर दिये गए । मगर बात तो वहीं पर है कि आखिर करोड़ों फूंकने के बाद भी अगर बच्चों को ये ही पता है कि भारत का प्रधानमंत्री बाबूलाल गौर हैं तो फिर मतलब क्या है ऐसे शिक्षा अभियानों का ।
Sunday, December 2, 2007
मेरे पिछले पोस्ट के साथ मेरी ये कविता ' मैं शर्मिंदा हूं मोदी जी ' भी पढ़ें । कुछ लोग शायद ये सोच रहे हैं कि मैं भी हिंदूवादी कोई व्यक्ति हूं । पर मैं केवल इंसानवादी हूं और अगर मैं हिन्दुओं को कटघरे में खड़ा करता हूं तो मुसलमानों को क्यों छोड़ूं
मैं शर्मिंदा हूँ मोदी जी
मैं बहुत बहुत शर्मिंदा हूँ मोदी जी
और शर्मिंदा हूँ
पन्द्रह साल पहले की अपनी नपुँसकता पर
मैं आपसे नज़रें तक नहीं मिला सकता
जिसके चलते ।
पन्द्रह साल पहले
जब आप ही के कुछ
महावीर ,प्रबल तथा पराक्रमी साथियों ने गिराया था,
ईंट गारे और पत्थर से बना वो ढाँचा
जो न जाने बनाया था किसने ?
और न जाने बनाया था
किसके लिये ?
राम के लिये ?
या अल्लाह के लिये ?
ठीक तब
वैसा ही कुछ हुआ था
जैसा आपके सौजन्य से
गाँधी के प्रदेश ?
उफ्फ़ क्षमा करें
आपके प्रदेश में हुआ है ।
तब ही की है वो बात
जिसके कारण मैं शर्मिंदा हूँ
आपसे ।
तब मेरे शहर में भी फ़ैली थी
आग,
जिसकी तपिश में गल गए थे
सारे नाते मोहल्लेदारी के !
हबीब भाई रहते हैं न जो
गली के नुक्कड़ पर
कहीं बाहर गए हुए थे वो
उस दौरान ।
आग की दहशत से डरकर
आ गए थे मेरे घर
दौड़कर
उनकी पत्नी
और तीन बच्चे
और अपने घर में दी थी उन्हें
सहर्ष पनाह
मैंने ।
कैसा अपराध किया था मैंने ?
अपराधी वैसे आपका प्रदेश भी है
क्योंकि पैदा हुआ था
आपके ही प्रदेश में
वो बुङ्ढा
जो गाया करता था
'' वैष्णव जन तो तेने कहिये
जे पीर पराई जाने रे ''
और उसी बुङ्ढे के कारण
पनाह दी थी
उन लोगों को
मैंने ।
शर्मिंदा इसलिये भी हूँ
मैं
कि पनाह दे दी थी
भले ही
फिर भी तो कर सकता था
काफ़ी कुछ मैं
घर मेरा जो था वो।
भले मुझसे काफी बड़ी थीं
हबीब भाई की पत्नी
नहीं कर सकता था
इसलिये
बलात्कार उनके साथ
किसी लिहाज़ के चलते,
पर मार तो सकता ही था
गला घोंट के
उनको।
और उनकी वो दो बेटियाँ
उफ्फ़!
किस कदर हसीन थीं वो
और मैं
मानता रहा बहनें
उनको
नहीं कर सका
दो अदद बलात्कार,
हो सकते थे
बड़ी आसानी से जो।
पन्द्रह सोलह साल का
कमसिन और ख़ूबसूरत
लड़का उनका
किस कदर डरा हुआ था
वो भी तो
उस दौरान।
न कर पाया मैं
उसकी बहनों से बलात्कार
पर कर तो सकता ही था
उसके साथ कुछ
अप्राकृतिक कृत्य जैसा
और कम से कम
बहुत आसानी से कर सकता था
ये तो।
लेकिन मैं कुछ भी नहीं कर पाया
न हत्या , न बलात्कार
न कुछ अप्राकृतिक और इसी कारण शर्मिंदा हूं
आज पन्द्रह वर्ष बाद भी
शर्मिंदा हूँ कि नहीं कर सका मैं सिद्ध
कि मैं हूँ
हिन्दू
और सही सलामत घर भेज दिया
उन चारों को
आग बुझ जाने के बाद।
बदले में क्या मिला मुझे ?
केवल वे चंद ऑंसू ही ना
जो हबीब भाई की ऑंखों से गिरकर
गुज़रते हुए उनकी दाढ़ी से
चू पड़े थे मेरे कंधे पर
तब
जब वे रोए थे गले लग कर
मुझसे
या वे धागे के टुकड़े
जिन्हें कहा जाता है
राखी
और जिन्हें बांधती आ रही हैं
मेरी कलाई पर
तब से ले कर आज तक
वो दोनो लड़कियाँ,
शादी होकर विदा हो जाने के बाद भी।
या वो संबोधन भाईजान का
उस लड़के द्वारा दिया हुआ ,
या तब से आज तक
हर ईद पर हबीब भाई
की पत्नी की और से
मिलने वाले दस रुपये
ईदी के
जो हमेशा मिलते हैं मुझे
सबसे पहले
उनके बच्चों से भी पहले ,
क्या कीमत है इन चीज़ों की?
कुछ भी तो नहीं।
हैना?
सचमुच कुछ भी तो नहीं
बस इसीलिये मैं शर्मिंदा हूँ मोदी जी,
परंतु अब भुला चुका हूँ
उस बुङ्ढे को तथा
उसके उस मनहूस गीत
''वैष्णव जन तो '' क़ो भी
तथा मान चुका हूँ अब आपको ही
अपना गुरु
जिस तरह मान लिया था
एकलव्य ने अपना गुरु
द्रोणाचार्य को
और अब देना चाहता हँ
गुरु दक्षिणा भी आपको
लेकिन चाहता हूँ
कि नहीं माँगें आप
मेरा अंगूठा,
आप माँग लें मेरे उस लिंग को
जो नहीं कर पाया
आसानी से सुलभ
कुछ बलात्कार,
सिद्ध करने के लिये मुझे
हिन्दू
आपकी ही तरह।
तब से ही महसूस करता हूँ
अपने आपको
नपुँसक
इसलिये अब नहीं पड़ता कोई फ़र्क
रहने से या न रहने से
लिंग के
हो सकता है
इससे हो जाए प्रायश्चित भी
मेरे उस पाप का
और हो जाऊँ शायद मैं भी
हिन्दू
आपकी ही तरह।
मैं कहीं सांप्रदायिक न हो जाऊं मुझे बचाओं मेरे मुस्लिम भाइयों
Thursday, November 15, 2007
हास्य कवि सम्मेलन आज, देश भर के दिग्गज हास्य और व्यंग्य के कवि आज सीहोर आऐंगें ओम व्यास ओम के संचालन में बहेगी हास्य और व्यंग्य की बयार
लीसा टॉकीज़ पर हर साल की तरह होने वाले हास्य कवि सम्मेलन की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं तथा शनिवार 17 नवंबर की रात को कवि सम्मेलन के मंच पर देश के दिग्गज हास्य कवियों के द्वारा हास्य व्यंग्य का जादू जगाया जाएगा । कार्यक्रम की अध्यक्षता सीहोर नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष श्री राकेश राय करेंगें, हेंडीक्राफ्ट बोर्ड के राष्ट्रीय संचालक श्री अक्षत कासट विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगें ।
आयोजन के संयोजक राजकुमार जायसवाल ने जानकारी देते हुए बताया कि हास्य कवि सम्मेलन को लेकर व्यापक स्तर पर तैयारियां की जा रहीं है । लीसा टॉकीा के मैदान पर होने वाले हास्य कवि सम्मेलन में आस पास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रोताओं के आने की संभवना को देखते हुए ये तैयारियां की जा रही हैं । उन्होंने बताया कि हास्य के सबसे बड़े सम्मान काका हाथरसी सम्मान से विभूषित श्री ओम व्यास ओम के संचालन में देश भर के कवि कविता पाठ करेंगें । श्री ओम व्यास का नाम पिछले कुछ वर्षों में हास्य के क्षेत्र में तेजी के साथ उभर कर आया है और अब संचालन के क्षेत्र में भी वे एक स्थापित नाम हैं वे अपनी चुटकियों से श्रोताओं को रात भर जागृत रखते हैं तथा कवि सम्मेलन में ऊर्जा बनाए रखते हैं । उनके अलावा वरिष्ठ कवि श्री माणिक वर्मा भी आ रहे हैं जो समूचे भारत ही नहीं बल्कि विश्व भर में अपनी विशिष्ट शैली के कारण जाने जाते हैं । हिंदी के ही एक और विशिष्ट शैली के कवि श्री सांड नरसिंहपुरी भी अपनी गुदगुदाने वाली शैली में श्रोताओं को भरपूर मनोरंजन करेंगें। हिंदी व्यंग्य के कवि और पुलिस महानिरीक्षक श्री पवन जैन भी कवि सम्मेलन में आ रहे हैं । राजस्थान के कवि बलवंत बल्लू जो देश भर के मंचों पर हास्य कवि के रूप में एक जाना पहचाना नाम हैं वे भी कवि सम्मेलन में पधार रहे हैं । इनके अलावा चुटीली व्यंग्योक्तियों के लिये मशहूर कवि श्री अशोक भाटी, हास्य के क्षेत्र में तेजी के साथ उभर कर सामने आ रहे कवि दिनेश याज्ञिक और हास्य व्यंग्य के क्षेत्र में एक सशक्त हस्ताक्षर श्री संतोष इंकलाबी जैसे हास्य कवि भी इस मंच पर काव्य पाठ करेंगें । आयोजन में मोनिका भोजक कवियित्री भुज कच्छ से पधार रहीं हैं और सूत्रधार सीहोर के ही युवा कवि पंकज सुबीर हैं । श्री जायसवाल ने बताया कि आयोजन में शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित सीहोर के वरिष्ठ गीतकार श्री रमेश हठीला के काव्य संग्रह बंजारे गीत का विमोचन भी किया जाएगा । इस अवसर पर सीहोर और प्रदेश को गौरवान्वित करने वाली कुछ शख्सियतों का सम्मान भी मंच से किया जाएगा जिनमें विश्व हिंदी सम्मेलन न्यूयार्क में वक्ता तथा कवि के रूप में भाग लेकर लौटे श्री पवन जैन, भारत सरकार के हेंडीक्राफ्ट बोर्ड के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में नियुक्त हुए श्री अक्षत कासट और बंजारे गीत के रचयिता श्री रमेश हठीला शामिल हैं । उन्होंने बताया कि पिछले वर्षों में लीसा टॉकी पर हुए कवि सम्मेलनों को भरपूर सफलता मिली है और सीहोर के कवि सम्मेलनों की गौरवशाली परंपरा को जारी रखने का कार्य इन आयोजनों द्वारा किया जा रहा है उसी कड़ी में इस बार हास्य कवि सम्मेलन का आयोजन कर एक नया प्रयास किया जा रहा है, इस बार प्रयास ये किया जाएगा कि ये आयोजन दो दौर में सुबह की पहली किरण तक चले ताकि उपस्थित श्रोता देश भर से पधारे इन दिग्गज हास्य कवियों का भरपूर आनंद ले सकें ।
Thursday, November 8, 2007
क्या आपने दूध की नदी बहते देखी है , नहीं देखी तो आइये सीहोर जिले के बारहखंभा में जहां दीवाली के दूसरे दिन बहती है सचमुच दूध की नदी
आज के इस युग में जहाँ पानी की नदी ही मुश्किल से बह पा रही हो वहाँ इस बात पर विश्वास करना जरा मुश्किल लगता है कि कभी दूध की नदियाँ भी बहती थीं । लेकिन सीहोर के बारह खंबा में यह दृष्य साल में एक बार दीपावली के दूसरे दिन साकार हो उठता है ।
सीहोर से लगभग पैंतीस किलोमीटर दूर स्थित दस पंद्रह मकानों का छोटा सा गाँव देवपुरा दीपावली के दूसरे दिन जीवंत हो उठता है । कितने लोग यहाँ पहुंचते हैं यह अनुमान लगाना तो मुश्किल है लेकिन चारों तरफ नज़र डालने पर एक जन समुद्र लहराता नज़र आता है । यहाँ पर स्थित बारह खंबा देव स्थल पर इस दिन विशाल मेला भरता है । यह मेला वास्तव में किसानों का मेला है । आसपास के जिलों से बड़ी संख्या में किसान यहाँ पहुंचते हैं । यह मेला दुधारू पशुओं से जुड़ी मान्यताओं का मेला है । न केवल सीहोर जिले बल्कि आसपास के जिलों के किसान भी अपने दुधारू पशुओं के बीमार होने पर मनौती मानते हैं कि यदि पशु स्वस्थ हो गया तो वे बारह खंभा मेला में दूध तथा नारियल चढ़ाऐंगें । वे किसान वर्ष में एक बार यहाँ दीपावली के दूसरे दिन दूध तथा नारियल चढ़ाने आते हैं । कुछ किसान यहाँ दूध तथा नारियल केवल इसलिये चढ़ाने आते हैं कि उनके पशु साल भर स्वस्थ रहें । हजारों की संख्या में आए ये ग्रामीण उस दिन का अपने दुधारू पशुओं का पूरा दूध यहां पर चढ़ाते हैं अब आप सोच ही सकते हैं कि दूध कितना हो जाता होगा ।
मंदिर में स्थित अनगढ़ पत्थर की प्रतिमा पर जब हजारों ग्रामीण दूध तथा नारियल चढ़ाते हैं तो मंदिर के पीछे बहने वाले नाले में दूध की बाढ़ आ जाती है ये नाला ऐसा लगता है जैसे कि दूध की नदी बह रही हो और पुरानी कहावत याद आ जाती है कि भारत में दूध की नदियां बहा करती थीं । कितने लीटर दूध यहां बह जाता है ये तो कोई भी नहीं बता सकता है पर नाले में उफान मारता दूध देख कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं और ये ही लगता है कि उस देश में जहां पर कई बच्चे भूख के कारण मर रहे हों वहां पर ये होना कितना ठीक हे । और मंदिर में लग जाता है फूटे हुए नारियलों का पर्वताकार ढेर । दीपावली के दूसरे दिन आस पास के सारे गांव के ग्रामीण केवल एक ही दिशा में यात्रा करते हैं बारह खंभा की दिशा में । इस देव स्थल से जुड़ी कई जनश्रुतियां भी हैं। बारह खंबा के इस मेले में नज़र आता है एक विशाल जन समुद्र और दूध की उफनती हुई नदी जो इस कल्पना को साकार करती है कि कैसे प्राचीन भारत में दूध की नदियाँ बहतीं थीं ।
Wednesday, November 7, 2007
'' किंग कोबरा हनुमान जी की अदालत में हाजिर हो..........! ''
'' किंगकोबरा हनुमान जी की अदालत में हाजिर हो .........! '' ऐसी कोई आवाज़ सीहोर से आठ किलोमीटर दूर स्थित लसुड़िया परिहार के मंदिर में लगती तो नहीं है ,लेकिन फिर भी यहाँ उस रोज़ हनुमान जी की अदालत में साँपों की पेशी होती है । दीपावली की पड़वाँ ( अगले दिन ) के दिन लसुड़िया परिहार के मंदिर में उन लोगों की भीड़ जुटती है जिन्हें पिछले दिनों में साँप ने काटा था तथा जिन्होनें इस मंदिर में आकर ज़हर उतरवाया था । पूर्व में यहाँ छोटा सा मंदिर था लेकिन अब यहाँ भव्य मंदिर है , साँप के काटने पर ग्रामीण लोग पीड़ित व्यक्ति को लेकर यहाँ आते हैं । यहाँ साँप का ज़हर उतर जाने के बाद एक धागा बाँध दिया जाता है , जिसे आने वाली दीपावली की पड़वां पर यहाँ आकर खोलना होता है ।
जब यहाँ सर्पदंश से पीड़ित लोग धागा खोलने आते हैं तो उनके शरीर में साँपों की पेशी भी होती है । ये साँप पीड़ित व्यक्ति के शरीर में आकर स्वयं बताते हैं कि उन्होंने इस व्यक्ति को क्यों काटा था। एक दिलचस्प बात ये होती है कि पीडि़त व्यक्ति का व्यवहार भी उस दौरान सांप की तरह का ही हो जाता है वो बाकयदा सांप की तरह लहरा कर चलता है जबान निकालता है और वैसा ही करता है जैसा कोई सापं करता है । कई दिलचस्प बातें भी होती हैं जैसे कोई बताता है कि मैं इनका पूर्वज हूँ इन्होंने मेरा ध्यान नहीं रखा इसलिये मैने काटा । कोई कहता है कि इन्होंने मेरे स्थान पर लघुशंका कर दी थी इसलिये काटा ,कोई पूँछ पर पाँव रख देने का सामान्य कारण बताता है । उस दौरान उस व्यक्ति का व्यवहार भी साँप की तरह ही हो जाता है । पीड़ित व्यक्ति के परिजन गलती की क्षमा माँगते हैं और साँप जी चले जाते हैं । पृथम दृष्टया ये बात कोरा अंधविश्वास लगती है लेकिन प्रत्यक्षदर्शी एसा नहीं मानते । दो सालों से यहाँ समाचार पत्रों तथा टी वी समाचार चैनलों के संवाददाताओं की भीड़ भी जुटने लगी है ।
Monday, October 29, 2007
मुस्लिम युवक ने दी मुखाग्नि स्नेह देने वाली हिंदू मां को
वैसे तो शांति बार्इ को कोई भी नहीं था और उसे निराश्रित ही माना जाता था । वो रहती भी मुस्लिम बहूल इलाके में थी मगर अपनी उम्र भर उसको अहसास नहीं हुआ कि वो निराश्रित है या फिर वो मुस्लिम बहुल इलाके में रह रही है । वो इसलिये क्योंकि वहां पर उसको जो स्नेह दो मुस्लिम युवको से मिला और उसने उन दोनों मुस्लिम युवकों को जो मातृवत स्नेह दिया उसके चलते उसे कभी भी निराश्रित होने का अहसास नहीं हुआ ।
मध्य प्रदेश के सीहोर की बात करें तो वैसे यहां पर कई बार फिजा को बिगाड़ने का प्रयास किया गया है पर ये शहर शांत ही रहा है और समय समय पर अपनी पहचान देता रहा है । यहीं की लाल मस्जिद में रहने वाली 85 वर्षिय शांति बाई वैसे तो निराश्रित थी मगर मुस्लिम बहुल इलाके में रहने वाली शांति बाई को कभी भी इसका अहसास नहीं हुआ । 15 साल पहले पति के निधन के बाद से वे अकेली ही रह रहीं थीं । पास में रहने वाले मोहम्मद अरशद और अरशद राइन उनके लिये पुत्र बने हुए थे । मोहम्मद राइन के अनुसार शांति मां उनको मातृवत स्नेह देतीं थीं और वे लोग भी उनके लिये बेटे समान ही थे । 85 वर्षीय शांति बाई को कभी भी अपने परिवार की याद नहीं सताती थी । मोहम्मद राइन के अनुसार शांति बाई ने उनुको जीवन भर मां की तरह से स्नेह दिया । वे उनके भोजन आदि के लिये मां की तरह से ही चिंतित रहती थीं और अगर उन लोगों को कभी घर आने में देर हो जाए तो चिंतित होकर दरवाजे पर रास्ता देखती रहती थीं । माता तुल्य शांति बाई के निधन पर इन मुस्लिम युवकों को लगा कि जैसे उनहोंने अपनी मां को ही खो दिया है । इन मुस्लिम युवकों ने न केवल अपनी मां को हिंदू रीति रिवाज से कंधा दिया बल्कि हिंदू रीति रिवाज से उनका अंतिम संस्कार भी किया और उस समय तो लोगों की आंखें नम हों गई जब मुस्लिम बेटे राइन ने अपनी हिंदू मां की चिता को मुखाग्नि देकर अपना फर्ज पूरा कर दिया । शायद ऐसी ही घटनाएं और ऐसे ही लोग अभी देश को सांप्रदायिकता के जहर से बचाए हुए हैं ।
Friday, October 19, 2007
अगर हिन्दू भाई हमारे लिये रोज़ा अफ़्तार रख सकते हैं तो हम नवरात्रि में साबूदाने की खिचड़ी क्यों नहीं बांट सकते मंदिर के सामने
ऊपर लिखा गया एक वाक्य ही वो वाक्य है जिसमें भारत की खुशहाली का सारा राज़ छुपा है । और ये वाक्य कह रहे हैं दो मुस्लिम मेहबूब और इशाक । ये बात दरअस्ल में वो बात है जो भारत की आत्मा की आवाज़ है और ये बात अगर गूंज बन कर पूरे भारत की हवाओं में फैल जाए तो फिर भारत