और हंसते-हंसते सीने पर गोली खाई 356 क्रांतिकारियों ने

सीहोर। सन 1857 व इससे पूर्व गुलाम भारतवर्ष पर जिन अंग्रेजों ने अपना शासन जमा रखा था उन अंग्रेजों की एक सैनिक छावनी सीहोर के सैकड़ाखेड़ी मार्ग पर सीवन नदी के किनारे पर स्थित थी। 1857 में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन (गदर) का शंखनाद जब पूरे देश में फैलने लगा तो सीहोर के सैनिकों ने पूरे देश का सबसे व्यवस्थित आंदोलन खड़ा कर दिया। उन्होने सारे अंग्रेजों को खदेड़-खदेड़ कर सीहोर से भगा दिया और सीहोर में अंग्रेजों के समानान्तर सरकार ''सिपाही बहादुर सरकार'' का गठन कर दिया। इस सरकार के ही कई कार्यालय थे, पुलिस फौज भी थे, सारी व्यवस्था थी। लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी बनी की भोपाल की बेगम के सहयोग से ''सिपाही बहादुर सरकार'' के सैनिकों को अंग्रेजो ने पकड़ लिया और उसी सैकड़ाखेड़ी स्थित चाँदमारी के स्थान पर सामुहिक रुप से गोली मार दी। वंदे मारतम, इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते यह 356 शहीद सैनिक भारत माता की स्वतंत्रता के लिये 14 जनवरी 1858 को शहीद हो गये...।
यह समृध्द इतिहास मध्य प्रदेश शासन संस्कृति विभाग द्वारा प्रकाशित किताब ''सिपाही बहादुर'' में स्पष्ट रुप से उल्लेखित है
भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन (गदर) 1857 का प्रारंभ 10 मई को मेरठ के खूनी हंगामे से हुआ था। 11 मई 1857 को बागी सिपाहियों ने लाल किला और दिल्ली पर कब्जा कर लिया था। इन्होने मुगल बादशाह शहंशाह बहादुर शाह जफर को अपना नेता बनाकर देशभर के राजाओं-नवाबों से अंग्रेजों को बाहर निकाल देने की अपील की। ये अपील देश में आग की तरह फैल गई। जिसका प्रभाव मालवा और मध्य भारत में सर्वाधिक रहा। यहाँ की फौजों ने अंग्रेजों से लोहा लेना शुरु कर दिया।
इन्दौर से महावीर कोठा के आते ही सीहोर में भी खड़ा हुआ आंदोलन और सारे अंग्रेज भाग गये
सीहोर की फौज के जो सिपाही इन्दौर वह महू में तैनात किये गये थे। उनमें से 14 बागी सिपाही क्रांतिकारी विचारों वाले सिपाही महावीर कोठ के नेतृत्व में वापस सीहोर आ गये थे। महावीर कोठ इन्दौर में रहकर अंग्रेजो की रक्षा करना देशद्रोह मानते थे, उन्होने दिलेरी से इसका विरोध किया और अपने साथ सिपाहियों को भी वापस सीहोर ले आये यह लोग 7 जुलाई को सीहोर आये। यहाँ आते ही सीहोर सैनिक छावनी में बगावत की तैयारी शुरु कर दी गई। सीहोर सैनिक छावनी के तेवर बिगड़ने से पॉलिटिकल एजेंट मेजर हेनरी विलियम रिकार्डरस घबरा गये। इन्होने सिकन्दर बेगम से बातचीत के बाद होशंगाबाद जाने का निर्णय लिया और 3 दिन के अंदर ही घबराकर 10 जुलाई 1857 को पॉलिटिकल एजेन्ट और उनके सभी अंग्रेज अपने परिवार (पत्नि-बच्चे) सहित होशंगाबाद चले गये। उस समय जाने के पहले 9 जुलाई को सीहोर फौज का पूर्ण चार्ज भोपाल रियासत को दे दिया था। सीहोर फौज का चार्ज भोपाल आर्मी के कमांडर इन चीफ बख्शी मुरव्वत मोहम्मद खॉ ने लिया था। इस प्रकार 10 जुलाई के बाद डर के मारे सीहोर छावनी में एक भी अंग्रेज बाकी नहीं रहा था। इसके तत्काल बाद सीहोर फौज के बगावती सैनिकों ने सरकारी खजाने लूट लिये, जेल और मेगजीन की इमारतों को तोड़ डाला। इसके तत्काल बाद अपनी एक सरकार ''सिपाही बहादुर'' के नाम से स्थापित कर दी गई। उन्होने जगह-जगह इस नई सरकार के झण्डे गाड़ दिये और मुसलमानो-हिन्दुओं से अपील की कि वे इस नई सरकार के हाथ मजबूत करें। उन्होने अपनी सरकार के तहत विभिन्न प्रशासनिक कार्यालय भी स्थापित करना प्रारंभ कर दिये।
सीहोर सैनिकों की बगावत मध्य भारत और पूरे मालवा की लड़ाई से अलग थी। यहाँ सबसे व्यवस्थित, मजबूत और सलक्ष्य आंदोलन की समझदार कोशिश की गई थी। यह एक क्रांतिकारी कदम था जिसमें हिन्दुस्तान से अंग्रेजों को निकालकर शासन की बागडोर भी संभाली गई हिन्दुस्तानी जनता के हाथों में यह व्यवस्था दी गई।
सुअर-गाय की चर्बी के कारतूस नष्ट किये
मेरठ की तरह सीहोर के फौजियों की भी एक शिकायत यह थी कि जो नये कारतूस फौज में उपयोग किये जा रहे हैं, उनमें गाय और सुअर की चर्बी मिली हुई है। सिपाहियों का विचार था कि अंग्रेज हिन्दुस्तानियों के दीन-ईमान को खराब कर देना चाहते हैं। इस अवसर पर किसी ने फौज में यह अफवाह फैला दी कि सिकन्दर बेगम अंग्रेजों को खुश करने के लिये छुपकर ईसाई हो गई है। इस अफवाह से फौज में रोष व्याप्त हो गया। जब यह अफवाह सिकन्दर बेगम तक पहुँची तो उन्होने अपने वकील मुंशी भवानी प्रसाद से बातचीत की लेकिन उन्होने शांत रहने की सलाह दी। कारतूसों में चर्बी के उपयोग की शिकायत की जांच फौज के बख्शी साहब की उपस्थिति में सीहोर के हथियार थाने में की गई। इस जांच में 6 पेटी में से 2 पेटी संदेहास्पद पाई गई, जिन्हे अलग कर दिया गया और ये आदेश दिये गये कि संदेह वाले कारतूसों को तोड़कर तोपों के गोला बारुद में उपयोग में लाया जायेगा। परन्तु इस आदेश के पश्चात भी हिन्दुस्तार के वीरे सिपाहियों में रोष्ज्ञ रहा उन्हे विश्वास था कि नये कारतूसों में अवश्य ही गाय और सुअर की चर्बी का उपयोग किया जा रहा है इस प्रकार फौज के बड़े वर्ग में बगावत फैल गई।
वो बहादुर देशभक्त
इस सिपाही बहादुर सरकार शासन को स्थापित करने वाले सीहोर फौज के चार देशभक्त बहादुर अफसर थे। भोपाल राय में यह पहली समानान्तर सरकार थी जो अंग्रेजी सरकार के खिलाफ स्थापित हुई थी। इस सरकार की स्थापना के समय बागी फौजियों को रियासत भोपाल के पॉलिटिकल एजेंट (जो वर्तमान कलेक्ट्रेट निवास में रहता था) के कार्यालय के पास जमा करने के बाद उनके सामने एक जोशीला भाषण रिसालदार वली शाह ने दिया था। जिनके साथ महावीर कोठा, रमजूलाल और आरिफ शाह भी शामिल थे।
उस समय भोपाल रियासत की कानूनी सत्तासीन शाहजहां बेगम (1939-1901) थीं परन्तु उनके कम उम्र होने के कारण एक समझौते के अन्तर्गत जिसको अंग्रेज सरकार की स्वीकृति थी उनकी माँ सिकन्दर बेगम को रियासत का प्रमुख घोषित कयिा गया था। इस प्रकार सिकन्दर बेगम ही वास्तवित रुप से शासक थी। 1857 में रियासत की सैना की तादाद कुल 4265 थी जिसमें 580 घुड़सवार थे। तोपखाना अलग था। जिनमें हल्की और भारी कुल 80 तोपे थीं। जिनके नाम भी विचित्र थे जैसे लीहू-दीहू, कड़क बिजली, जलपुकार, अंगड़ी-बंगड़ी, लैला-मजनू, धूल-धानी, फतह, दौलत आदि।
सीहोर में रहते थे सैनिक
1848 से ही भोपाल की एक फौज को सीहोर में अंग्रेजी सैनिकों की कमान में प्रशिक्षण दिया जाता था (यह प्रशिक्षण केन्द्र चाँदमारी कहलाता था, जो सैकड़ाखेड़ी मार्ग अरोरा अस्पताल के पीछे सीवन नदी के किनारे-किनारे स्थित था) सीहोर में रहने वाली फौज का नाम भोपाल कन्टिनजेंट था। ये फौज सिकन्दर बेगम के पति नवाब नजर मोहम्मद खां और ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच हुए एक समझौते के अन्तर्गत गठित की गई थी। इसका पूरा व्यय भोपाल रियासत वहन करती थी। फौज के कर्मचारियों को भर्ती के समय बाण्ड भी प्रस्तुत करना होता था कि वो अंग्रेज सरकार के वफादार रहेंगे। इस फौज के कर्मचारियों को 3-4 रुपया महिना वेतन दिया जाता था, जबकि उस समय सिंधिया, होल्कर रियासत में 7-8 रुपये वेतन दिया जाता था।
और वह हसंते-हसंते शहीद हो गये
14 जनवरी 1858 को इन राष्ट्रवादी सैनिकों को सजा-ए-मौत दी गई। देशभक्ताें ने भारत माता की आजादी के लिये सरकार से समझौता करने के बजाय अत्याधिक दिलेरी से मौत को गले लगाया और अपने सीने पर गोलियाँ खाकर देश के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया। किताब हयाते सिकन्दरी के अनुसार 14 जनवरी 1858 को 356 शहीद सैनिकों को जनरल ह्यूरोज के आदेश के बाद गोलियाँ से उड़ा दिया गया। उस वर्ष सीहोर में खूनी संक्राति मनी थी।
दुर्भाग्य से आज तक सीहोर के इन शहीदों का स्मरण न तो सीहोर ने किया और ना ही मध्य प्रदेश शासन ने इस व्यवस्थित इतिहास को आवश्यक रूप से शिक्षा विभाग के पाठय पुस्तकों में ही कोई स्थान दिलाया। आज भी इन शहीदों के समाधियाँ सैकड़ाखेड़ी मार्ग पर स्थित हैं जहाँ विगत कुछ वर्षों से बसंत उत्सव आयोजन समिति द्वारा एक पुष्पांजली कार्यम भर ही किया जाता है जबकि शासन द्वारा न तो इन अवशेषों के संरक्षण के लिये कोई प्रयास किया जा रहा है न ही इस दिन विशेष छुट्टी आदि रखी जाती है।

5 comments:

Udan Tashtari said...

नई जानकारी मिलि, आभार!!

seema gupta said...

इन शहीदों को हमारी श्रदांजली ..आभार की आपने इनकी देशभक्ति के जज्बे को आज इन्हें याद करते हुए हम सबको भी इनके बलिदान से अवगत कराया....
regards

सुलभ 'सतरंगी' said...

शहीदों को मेरी श्रदांजली...
आज ये भी एक लड़ाई है इतिहास के महान सपूतों के बलिदान (धरोहर) को बचाना..

गौतम राजरिशी said...

कुमार विश्वास के बहाने एक अद्‍भुत जानकारी से रुबरु हुए....मुझे नहीं लगता कि इतिहास के इस टुकड़े से ज्यादा लोग वाकिफ़ होंगे।

Apanatva said...

ye bade khed kee baat hai.........