एतिहासिक सूर्य ग्रहण के बारे में सम्‍पूर्ण जानकारी, कब कब हुआ है भारत में पूर्ण सूर्य ग्रहण और अब कब कब होगा ।

ज्ञात इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है कि सूर्यग्रहण का केन्द्र सीहोर जिले से होकर निकल रहा है । ज्ञात इतिहास इसलिये कि पिछले दो सौ सालों के इतिहास में कोई उदाहरण नहीं मिल रहा है कि सीहोर से होकर ये ग्रहण की केन्द्रीय रेखा निकली हो । ये पहली बार ही हो रहा है कि सीहोर जिले से  होकर ये केन्द्रीय रेखा निकल रही है । किन्तु मानसून के बादलों का जिस प्रकार से आसमान पर जमावड़ा हो रहा है उससे तो ये ही लगता है कि ये ऐतिहासिक पल बादलों के पीछे ही छुपा रहकर गुजर जायेगा ।  22 जुलाई के मौसम को लेकर जो संकेत हैं वे ग्रहण देखने वालों के लिये निराशाजनक हो सकते हैं । जीवन में पहली बार पूर्ण सूर्यग्रहण देखने की इच्छा बादलों के पीछे छुप सकती है क्योंकि बंगाल की खाड़ी में एक कम दबाव का क्षेत्र बन गया है ।

Solar_eclipse_animate_(2009-Jul-22)
(साभार नासा से )

न भूतो न भविष्यति, यही कहा जा सकता है 22 जुलाई को पड़ने वाले पूर्ण सूर्य ग्रहण के बारे में । ऐसा इसलिये कि जो सीहोर क्षेत्र में इससे पूर्व कभी भी पूर्ण सूर्यग्रहण पिछले दो सौ सालों के सूर्य ग्रहण के ज्ञात इतिहास में नही दिखाई दिया है । भारत में सूर्य ग्रहणों के इतिहास पर एक शोध पत्र पर कार्य कर रहे सीहोर के युवा साहित्यकार पंकज सुबीर के अनुसार मध्यप्रदेश का वो इलाका जहां पर ये सूर्य ग्रहण खग्रास रूप में दिखाई देगा वहां पर ऐसा पिछले ज्ञात इतिहास में दो सौ वर्षों में नहीं हुआ है । यदि पिछले 200 सालों के इतिहास पर नार डालें तो 1800 से लेकर आज तक भारत में कुल ग्यारह खग्रास सूर्यग्रहण दिखाई दिये हैं । 17 जुलाई 1814, 19 नवंबर 1816, 21 दिसंबर 1843, 18 अगस्त 1868, 12 दिसंबर 1871, 22 जनवरी 1898, 21 अगस्त 1914, 30 जून 1954, 16 फरवरी 1980, 24 अक्टूबर 1995 तथा 11 अगस्त 1999 ये 1800 से लेकर अब तक भारत में दिखाई दिये पूर्ण सूर्यग्रहण हैं । इन सारे सूर्यग्रहणों में से केवल 1898, 1995 तथा 1999 में ही ऐसा हुआ था कि पूर्ण सूर्यग्रहण की पट्टी मध्यप्रदेश को छूकर गुजरी थी लेकिन तीनों ही अवसरों पर ये पट्टी मध्यप्रदेश के बीच से होकर नहीं गुजरी थी बल्कि एक सिरे को छूते हुए गुजर गई थी । 22 जनवरी 1898 को खग्रास सूर्यग्रहण की पट्टी उस क्षेत्र से गुजरी थी जो अब छत्तीसगढ़ है । 24 अक्टूबर 1995 को खग्रास सूर्य ग्रहण में चंद्रमा की पूर्ण छाया भिंड और मुरैना को छूती हुई गुजरी थी वहीं  11 अगस्त 1999 को ये बड़वानी छाबुआ को छूती हुई निकली थी । किन्तु इस बार अर्थात 22 जुलाई 2009 को पूर्ण सूर्यग्रहण की लगभग दो सौ किलोमीटर चौड़ी पट्टी पूरे मध्यप्रदेश के बीचों बीच से होकर निकल रही है तथा खरगौन, खंडवा, धार, इन्दौर, उौन, देवास, सीहोर, भोपाल, हरदा, होशंगाबाद, खंडवा, सागर, शहडोल, दमोह, रीवा, सतना जैसे क्षेत्रों से होकर चंद्रमा की छाया सूर्य को पूरी तरह से अपनी ओट में लिये हुए गुजरेगी । चंद्रमा की ये छाया जिस लगभग दो सौ किलोमीटर चौड़ी पट्टी से होकर निकलेगी उसको तीन भागों में बांटा गया है । पट्टी का दोनों तरफ का सबसे बाहरी किनारा जहां केवल एक मिनिट के लिये ये नजारा दिखाई देगा, उसके अंदर का क्षेत्र जहां पर दो मिनिट के लिये ये नजारा दिखेगा और सबसे अंदर केन्द्रीय लाइन जिसके आसपास के इलाकों में ये अद्भुत खगोलीय घटना पूरे तीन मिनिट तक दिखाई देगी । श्री सुबीर के अनुसार इसके बाद मध्यप्रदेश के इन क्षेत्रों को लगभग 115 साल की प्रतीक्षा फिर से करनी होगी इस अनूठी घटना का साक्षी बनने के लिये । क्योंकि इसके बाद 14 मई 2124 को लगभग इसी क्षेत्र से होकर पूर्ण सूर्यग्रहण की पट्टी गुजरेगी । हालंकि 22 जुलाई के  पूर्ण सूर्यग्रहण के बाद भारत में 20 मार्च 2034 तथा 3 जून 2114  को भी पूर्ण सूर्य ग्रहण दिखाई देगा लेकिन 2034 में वो केवल कश्मीर के कुछ इलाकों तक सीमित रहेगा वहीं 2114 में राजस्थान यूपी और बंगाल में दिखाई देगा । इस प्रकार से ये सूर्यग्रहण सीहोर  के  निवासियों के लिये न भूतो न भविष्यति होने जा रहा है क्योंकि पिछले दो सौ सालों में इन इलाकों में पूर्ण सूर्यग्रहण नहीं दिखाई दिया है और आने वाले 115 सालों तक फिर से कोई संभावना नहीं है ।
सूर्योदय के साथ ही ग्रहण होगा :-सीहोर में सूर्य ग्रहण की शुरूआत सुबह लगभग 6 बजकर 23 मिनिट तथा 30 सेकेंड पर होगी तथा 6 बजकर 25 मिनिट 5 सेकेंड तक ये ग्रहण रहेगा।  ।  हालंकि 22 जुलाई को सूर्य उदय का समय 5 बजकर 46 मिनिट है अत:  ये कहा जा सकता है कि उदय होने के लगभग 36 मिनिट बाद ही सूर्य को चंद्रमा  ढंक लेगा । तथा लगभग तीन मिनिट तथा 9 सेकेंड तक ये सूर्य के सामने रहेगा। लगभग 6 बजकर 23 मिनिट तथा 30 सेकेंड पर सूर्य पूरी तरह से चंद्रमा के पीछे आ जायेगा तथा वो स्थिति बन जायेगी जिसको कि खग्रास ग्रहण कहते हैं । चंद्रमा की काली छाया के चारों तरफ से सूर्य की लपटें दिखाई देंगीं । उसके बाद धीरे धीेर सूर्य चंद्रमा के पीछे से बाहर आने लगेगा तथा अचानक ही जब वो चंद्रमा के एक कोने से बाहर आयेगा तो ऐसा लगेगा कि मानो एक अंगूठी है जिसके ऊपर एक हीरा जड़ा है । ये सूर्यग्रहण की सबसे सुंदर स्थिति होती है जिसे हीरक मुद्रिका कहा जाता है । उसके बाद सूर्य धीरे धीरे चंद्रमा के पीछे से बाहर आता जायेगा ।  वैज्ञानिकों को इन दोनों ही अवस्थाओं का इंतजार होता है । पंकज सुबीर के अनुसार जब सूर्य पूरी तरह से चंद्रमा के पीछे चला जाता है तो उस समय सूर्य की लपटों का अध्ययन करने में आसानी होती है । 
ग्रहण की केन्द्रीय रेखा :- इस बार सीहोर जिला पूरी तरह से तो उस दो सौ किलोमीटर चौड़ी पट्टी में है ही लेकिन खास बात ये है कि सेण्ट्रल लाइन आफ इकलिप्स (ग्रहण की केन्द्रीय रेखा) भी जिले से  होकर निकल रही है । इस केन्द्रीय रेखा के ठीक नीचे  जो गांव पड़ रहा है वो लाड़कुई से पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित गांव गूलरपुरा है । 

gularpura 3

(साभार गूगल)

गूलरपुरा के ठीक ऊपर से होकर ये केन्द्रीय रेखा निकल रही है । गूलरपुरा का वैज्ञानिक दृष्टि से महत्व इसलिये अधिक है क्योंकि सारे वैज्ञानिक प्रयोग इसी केन्द्रीय रेखा पर किये जाते हैं ।  ग्रहण की केन्द्रीय रेखा पर ग्रहण की अवधि कुछ अधिक भी होती है तथा चूंकि ये छाया का केन्द्र होता है अत: यहां पर ग्रहण बिल्कुल पूर्ण होता है । वैज्ञानिक प्रयोगों के लिये सेण्ट्रल लाइन आफ इकलिप्स को सबसे उपयुक्त माना जाता है क्योंकि चंद्रमा की परछांई और सूर्य का केन्द्र यहां पर एकाकार हो जाता है ।  गूलरपुरा जहां से होकर छाया का केन्द्र निकलेगा वो सड़क मार्ग से केवल दो किलोमीटर होने के कारण पहुंच में भी है अत: वैज्ञानिकों का जमावड़ा यहां हो सकता है । यही स्थिति लाड़कुई से 3.5 किलोमीटर पर नसरुल्लागंज मार्ग की भी है । ये दोनो ही स्थान वैज्ञानिक प्रयोगों के लिये सबसे अच्छे स्थान हैं ।
ग्रहणों का वर्ष है ये :- पंकज सुबीर के अनुसार वर्ष 2009 को ग्रहणों का वर्ष कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । इसी कारण योतिषियों के माथे पर भी चिंता की लकीरें दिखाई दे रही हैं । दरअसल साल की शुरुआत ही ग्रहण के साथ हुई थी 26 जनवरी 2009 को खंडग्रास सूर्य ग्रहण लगा था । 9 फरवरी 2009 को चंद्रग्रहण लगा था जो भारत के दक्षिणी पश्चिमी हिस्से में दिखाई दिया था । 7 जुलाई 2009 को पुन: चंद्रग्रहण लगा जो कि भारत में दिखाई नहीं दिया । दरअसल में इसी ग्रहण के साथ एक विचित्र सी तिकड़ी की शुरूआत हुई है 7 जुलाई को पूर्णिमा पर चंद्रमा पर ग्रहण लगा, फिर 22 जुलाई को अमावस्या पर सूर्य पर पूर्ण ग्रहण लग रहा है और उसके बाद 6 अगस्त 2009 को पूर्णिमा पर फिर से चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है । ये खतरनाक तिकड़ी ज्‍योतिषियों को परेशानी में डाल रही है । इसके बाद एक बार फिर साल के अंत में 31 दिसंबर 2009 को चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है ।  इस प्रकार साल भर में चार चंद्र और दो सूर्य ग्रहण हो रहे हैं । और उसमें से भी एक सदी का सबसे बड़ा खग्रास सूर्य ग्रहण है ।  ईसा पूर्व 3067 ईस्वी में इसी प्रकार की एक तिकड़ी बनी थी इसमें एक खग्रास सूर्य ग्रहण था जो कि 14 अक्टूबर 3067 को पड़ा था । माना जाता है कि ये वही दिन है जिस दिन अर्जुन ने जयद्रथ  का वध किया था । इस प्रकार तिकड़ी के चलते महाभारत जैसा भयंकर युध्द हुआ था । फिर ईसा पूर्व ही 3031 में ऐसी तिकड़ी बनी थी तथा ऐसा माना जाता है कि ये वो ही साल है जब किसी प्राकृतिक आपदा के कारण द्वारका समुद्र में समा गई थी । इस बार भी वही तिकड़ी बन रही है ।

eclipse copy 2


कहां कहां ग्रहण :-ये केन्द्रीय रेखा खातेगांव तथा कन्नौद के ठीक बीच से होकर  नसरुल्लागंज तहसील में सीप नदी के पास से प्रवेश करेगी । इस केन्द्रीय रेखा के ठीक नीचे  जो गांव पड़ रहा है वो लाड़कुई से पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित गांव गूलरपुरा है ।  इसके बाद ग्रहण की केन्द्रीय रेखा लाड़कूई तथा नसरुल्लागंज मार्ग को लाड़कुई से लगभग साढ़े तीन किलोमीटर दूर पर पार करेगी उसके बाद ये ग्रहण की केन्द्रीय रेखा आगे की ओर बढ़ जायेगी तथा चकल्दी गांव से कुछ दूरी से होकर निकलेगी, इसके बाद  कोलार नदी के ठीक पास से होती हुई रायसेन जिले में प्रवेश कर जायेगी । इस प्रकार नसरुल्लागंज तहसील का वैज्ञानिक महत्व ग्रहण के दौरान सबसे अधिक रहेगा क्योंकि ग्रहण की केन्द्रीय रेखा इसी क्षेत्र से होकर निकलेगी । ग्रहण की केन्द्रीय रेखा से दूरी की बात की जाये तो नसरुल्लागंज से लगभग आठ किलोमीटर, रेहटी से 6 किलोमीटर, सीहोर से 30 किलोमीटर, इछावर से 20, बुदनी से 10 तथा आष्टा से 25 किलोमीटर की दूरी इस रेखा की रहेगी । सबसे नजदीक रहेगा लाड़कुई जो केवल साढ़े तीन किलोमीटर की दूरी पर रहेगा । किन्तु सबसे चर्चित होगा गूलरपुरा जिसके ठीक ऊपर से चंद्रमा की छाया का केन्द्र गुजरेगा ।
सावधानियां :- सूर्य ग्रहण के दौरान अल्ट्रावायलेट तथा इन्फ्रारेड किरनों के कारण आंखों को नुकसान पहुंचने की संभावना रहती है । अत: सूर्य ग्रहण के दौरान सूर्य का नंगी आंखों से नहीं देखें । ग्रहण का चित्र लेते समय भी लैंस पर यूवी फिल्टर लगाना आवश्यक होता है । अच्छे किस्म के चश्मे जो कि यूवी फिल्टर से युक्त होते हैं उनके द्वारा ही ग्रहण को देखें ।
क्या क्या देखें :-  सूर्य ग्रहण के दौरान ही मंगल, बुध, बृहस्पति व शुक्र ग्रह भी दिखाई देंगे। सूर्य से 9 डिग्री पूर्व में बुध ग्रह ओर 41 डिग्री पश्चिम में शुक्रग्रह को देखा जा सकेगा। मंगल ग्रह शुक्र के पश्चिम में ठीक बगल में होगा। बृहस्पति पश्चिम में नीचे की ओर देखा जा सकेगा। इनके अलावा प्रोकीयान, सीरियस, बेटलगेस, रिगेल और सिपेला तारे भी दिखेंगे। 22 जुलाई का सूर्य ग्रहण कर्क राशि पुष्य नक्षत्र में हो रहा है ग्रहण का स्पर्श प्रात: 5 बज कर 23 मिनिट तथा मोक्ष 7 बजकर 26 मिनिट पर होगा ।
नहीं जागे तो 115 सालों का इंतजार :- वे लोग जो सुबह जल्दी नहीं उठते हैं यदि वे 22 जुलाई को भी देर से सोकर उठे तो उनको फिर 115 सालों का इंतजार करना होगा । क्योंकि उसके बाद सीहोर में पूर्ण सूर्य ग्रहण 14 मई 2124 को ही दिखाई देगा । तो यदि आप 22 जुलाई को जल्दी सोकर नहीं उठे तो फिर आपको 115 सालों का लम्बा इंतजार करना होगा, जो कोई भी नहीं करना चाहेगा ।
बादल बनेंगें खलनायक :- सीहोर इलाके पर पहली बार दिखाई दे रहे पूर्ण सूर्य ग्रहण और उत्सुक लोगों के बीच बादल खलनायक की भूमिका निभा सकते हैं । क्योंकि बंगाल की खाड़ी के पास एक कम दबाव का क्षेत्र बन गया है जिसके कारण संभावना ये है कि 22 जुलाई की सुबह बादलों से ढंकी हुई हो । उस स्थिति में जीवन का पहला पूर्ण सूर्य ग्रहण देखने वालों को निराशा का सामना करना पड़ सकता है ।

क्या होती है ग्रहण की केन्द्रीय रेखा : चंद्रमा की परछांई पृथ्वी पर वृत्ताकार रूप में पड़ती है । इस वृत्त का जो केन्द्र बिन्दु होता है वो जैसे जैसे परछांई आगे बढ़ती है वैसे वैसे सरल रेखा में आगे बढ़ता है । ये सरल रेखा ही कहलाती है ग्रहण की केन्द्रीय रेखा (सेण्ट्रल लाइन आफ इकलिप्स)। इस बार भी जब चंद्रमा की परछांई गुजरात से होकर मध्यप्रदेश से होती हुई उत्तर पूर्व को बढ़ेगी तो परछांई का केन्द्र बिंदु वैज्ञानिको के आकर्षण का केंद्र रहेगा और सीहोर जिले के दक्षिणी भाग में ये केंद्र सीप नदी, गूलरपुरा, से होता हुआ कोलार नदी तथा पर्वतीय क्षेत्र से गुजरेगा ।
क्या महत्व है केन्द्रीय रेखा का : पंकज सुबीर के अनुसार ग्रहण की केन्द्रीय रेखा पर ग्रहण की अवधि कुछ अधिक भी होती है तथा चूंकि ये छाया का केन्द्र होता है अत: यहां पर ग्रहण बिल्कुल पूर्ण होता है । वैज्ञानिक प्रयोगों के लिये सेण्ट्रल लाइन आफ इकलिप्स को सबसे उपयुक्त माना जाता है क्योंकि चंद्रमा की परछांई और सूर्य का केन्द्र यहां पर एकाकार हो जाता है ।  गूलरपुरा जहां से होकर छाया का केन्द्र निकलेगा वो सड़क मार्ग से केवल दो किलोमीटर होने के कारण पहुंच में भी है अत: वैज्ञानिकों का जमावड़ा यहां हो सकता है । यही स्थिति लाड़कुई से 3.5 किलोमीटर पर नसरुल्लागंज मार्ग की भी है । ये दोनो ही स्थान वैज्ञानिक प्रयोगों के लिये सबसे अच्छे स्थान हैं ।
कहां है गूलरपुरा : लाड़कुई से नसरुल्लागंज जाने वाले मार्ग पर लगभग साढ़े चार किलोमीटर की दूरी पर दांये हाथ पर गूलरपुरा जाने वाला मार्ग जाता है जहां से दो किलोमीटर की दूरी नसरुल्लागंज तहसील का गांव गूलरपुरा, पर स्थित है । वैज्ञानिक भाषा में ये गांव 22.779357 डिग्री उत्तर अक्षांश तथा 77.238473 पूर्व देशांश पर स्थित है । गांव को देखने यहां गूलरपुरा क्लिक करें । शोध पत्र के लिये यहां शोध पत्र पर क्लिक करें ।
इतिहास Ñ यदि पिछले 200 सालों के इतिहास पर नार डालें तो 1800 से लेकर आज तक भारत में कुल ग्यारह खग्रास सूर्यग्रहण दिखाई दिये हैं । 17 जुलाई 1814, 19 नवंबर 1816, 21 दिसंबर 1843, 18 अगस्त 1868, 12 दिसंबर 1871, 22 जनवरी 1898, 21 अगस्त 1914, 30 जून 1954, 16 फरवरी 1980, 24 अक्टूबर 1995 तथा 11 अगस्त 1999 ये 1800 से लेकर अब तक भारत में दिखाई दिये पूर्ण सूर्यग्रहण हैं । सीहोर  को लगभग 115 साल की प्रतीक्षा फिर से करनी होगी इस अनूठी घटना का साक्षी बनने के लिये । क्योंकि इसके बाद 14 मई 2124 को लगभग इसी क्षेत्र से होकर पूर्ण सूर्यग्रहण की पट्टी गुजरेगी । हालंकि इस पूर्ण सूर्यग्रहण के बाद भारत में 20 मार्च 2034 तथा 3 जून 2114  को भी पूर्ण सूर्य ग्रहण दिखाई देगा लेकिन 2034 में वो केवल कश्मीर के कुछ इलाकों तक सीमित रहेगा वहीं 2114 में राजस्थान यूपी और बंगाल में दिखाई देगा।

13 comments:

Udan Tashtari said...

अरे बाप रे!! यह तो पूरी वैज्ञानिक पोस्ट दे डाली और हम आये थे गुरु जी की शायरी पढ़ने. जबरदस्त जानकारी. आभार.. ज्ञान के अथाह सागर में हिचकोले खा रहे हैं. आप वजह हैं अगर डूब डाब गये तो!!

Nirmla Kapila said...

सुबीर जी की इस प्रतिभा से वाकिफ नहीं थे इस बहुयायामी प्रतिभा को नमन बहुत बदिया जानकारी है हम 115 साल इन्तज़ार नहीं करेगे हाम्म् अगर बादल नाम के खल्नायक रास्ते मे ना आ गये बहुत बहुत धन्यवाद इस ग्यानवर्द्धक पोस्ट के लिये

yograj sharma said...

जानदार जानकारियों को शानदार संग्रह...

अद्भुद...
रोचक
विस्मयकारी
आपकी प्रतिभा का नमन
योगराज शर्मा
मेट्रो हेड
इंडिया न्यूज चैनल
09899705042

डॉ. मनोज मिश्र said...

ग्यानवर्द्धक पोस्ट,बहुत धन्यवाद.

सौरभ शर्मा said...

जबरदस्त जानकारी है और रौचक भी . बधाई हो इस चिट्ठे के लिए

नीरज गोस्वामी said...

मान गए गुरु देव क्या ग़ज़ब की जानकारी दी है आपने इस खगास सूर्य ग्रहण पर...कहाँ से इतनी जानकारी इकठ्ठा की ?अगर बादल न हुए तो आपके खींचे चित्र देखने को मिल जायेंगे, जिसकी सम्भावना बहुत कम दिखाई दे रही है...
नीरज

दिगम्बर नासवा said...

क्या बात है........... गुरुदेव आपने तो poore के poora ही itihas likh daala grehan kaa........... इतनी vistrat jankaari से tayaar kiya shodh ............ लाजवाब........... प्रणाम है एक baar फिर से आपकी kalam को

Dipti said...

इस पूरी जानकारी के लिए धन्यवाद। सच में ये वाकई लाभदायक सिद्ध होगी।

कंचन सिंह चौहान said...

सोचती हूँ कि बहुत भाग्यशाली हूँ कि आप को गुरु रूप में पाया। कितना ज्ञान है आपमें।

पूरा आलेख पढ़ा। आपके ज्ञान पर आश्चर्य हुआ और साथ ही ये सोच कर कहीं मन आशंकित भी कि इस बार क्या होगा इस तिकड़ी के संयोग पर।

कंचन सिंह चौहान said...

सोचती हूँ कि बहुत भाग्यशाली हूँ कि आप को गुरु रूप में पाया। कितना ज्ञान है आपमें।

पूरा आलेख पढ़ा। आपके ज्ञान पर आश्चर्य हुआ और साथ ही ये सोच कर कहीं मन आशंकित भी कि इस बार क्या होगा इस तिकड़ी के संयोग पर।

abhivyakti said...

गुरुदेव
पढ़कर पता लग गया कि आपने कितनी मेहनत की होगी.और तनिक आर्श्चय भी हुआ कि आप कितनी कितनी विधाओं में निपुण है.२४ अक्टूबर ३०६७ ईसा पूर्व का ग्रहण महाभारत के काल निर्धारण में सहायक है.कृपया यह भी बताएं कि महाभारत काल के खग्रास सूर्य ग्रहण में सेंट्रल लाइन ऑफ़ इक्लिप्स कहाँ से गुजरी थी. क्या इससे कुरुक्षेत्र को पहचाना जा सकता है?और यह भी कि क्या महाभारत के युद्ध की ऐतिहासिकता साबित की जा सकती है?
अब तो आपकी सूर्य ग्रहण की तस्वीरों का इन्तजार रहेगा...और डायमंड रिंग तो जरूर दिखलाएं !मैं तो अभिभूत हूँ ब्रह्मांडीय श्रृंगार आपकी कलम और तस्वीरों में कैसा अद्भुत लगेगा?
प्रकाश पाखी

venus kesari said...

गुरु जी प्रणाम
आज सुबह सोच ही रहा था की गुरु जी ने सूर्य ग्रहण पर आलेख की जो पोस्ट लगाने को कही थी वो आज लगे होगी
ग्रहण के बाद पोस्ट लगाने का क्या औचित्य होगा
और ब्लॉग पर आ कर देखा तो सोचना सही सिद्ध हुआ
बहुत रोचक और विस्तृत जानकारी आपने, वैसे मैंने एक और सूर्य ग्रहण देखा है जिसमे डाईमंड रिंग बनी थी मगर जहाँ तक मुझे पता है वो पूर्ण सूर्य ग्रहण नहीं था
आपकी मेहनत को सतत नमन है

इस बार तो देख नहीं पाऊगा, इलाहाबाद में बारिश का जलवा है :(

वीनस केसरी

गौतम राजरिशी said...

कैसे कर लेते हैं आओ इतना सब कुछ? थकते नहीं क्या?
ये सब बातें तो मालूम ही नहीं था हमें।
यहाँ पर लगभग तीन-पूरे तीन मिनट तक रात रही..तारे भी निकल आये...
अद्‍भुत थी प्रकृति की ये लीला