अब समाचार पत्र वाले शायद पाठकों को मूर्ख समझने लगे हैं ।

कल ही मैंने जागरण के बारे में लिखा था और आज ही अपने दूसरे फेवरेट पर कलम चलानी पड़ रही है । कल नवदुनिया जो कि वास्‍तव में नई दुनिया है और हमारे यहां पर नाम बदल कर नवदुनिया के नाम से आता है । कुछ दिनों से मैं देख रहा हूं कि कि नवदुनिया में ऐसे समाचार हमारे पृष्‍ठ पर लगे मिलते हैं जिनका हमारे शहर से कोई लेना देना नहीं होता है । मगर फिर भी उनको हमारे पृष्‍ठ पर हमारे ही शहर के नाम से लगाया जाता है । पहले तो मैंने सोचा कि ग़लती से लग गया होगा । मगर बाद में पता चला कि ये तो अमा बात है आजकल एक नये तरह की पत्रकारिता चल रही है जिसको कि कहा जाता है टेबल पत्रकारिता । इस पत्रकारिता में होता ये है कि एक समाचार बनाया जाता है और सारे केन्‍द्रों को भेज दिया जाता है कि इसको अपने अपने पृष्‍ठ पर अपने शहर की डेट लाइन के साथ लगा लिया जाये । समाचार का भले ही उस शहर से कोई लेना देना हो या नहीं हो लेकिन उसको लगाया जाता है । ये जो टेबल पत्रकारिता है इसमें हमारे इंटरनेट का भी योगदान कम नहीं है । अब जैसे एक खबर किसी संपादक ने नेट पर देखी जिसमें हेडिंग था नये धारावाहिकों का प्रसारण नहीं होने के कारण दर्शकों में निराशा । अब संपादक महोदय क्‍या करते हैं कि नेट से समाचार को कापी करते हैं और अगर फोंट बदलने की ज़रूरत हो तो बदल कर सारे सेंटरों को भेज देते हैं कि इस समाचार को अपने पृष्‍ठ पर लगा लो और इसमें लोकल के एक दो लोगों के नाम लगा देना । पता चलता है कि अगले दिन समाचार पत्र के सारे स्‍थानीय संस्‍करणों में स्‍थनीय पृष्‍ठ पर डेटलाइन बदल बदल कर ये समाचार लगा होता है । अगर आपने सीहोर में ये समाचार पढ़ा था जिसमें डेट लाइन सीहोर लगी थी और आप किसी काम से होशंगाबद उसी रोज गये तो आपको पता लगेगा कि ये समाचार तो होशंगाबाद में भी होशंगाबाद की डेट लाइन के साथ लगा है । ये किस प्रकार की पत्रकारिता है मेरे तो समझ से बाहर की बात है ।

चलिये आज की बात करें कि आज नवदुनिया ने क्‍या किया है । हां ये बात तो है कि जलसंकट आने वाला है मगर उस जल संकट के चलते आप समाचार पत्र के स्‍थानीय संस्‍करण का पूरा पृष्‍ठ ही समर्पित कर दें । पाठक तो ज्‍यादा से ज्‍यादा समाचार चाहता है और आपने एक पूरा पेज ऐ ही समाचार को दे दिया । तिस पर भी ये कि समाचार तो कहीं है ही नहीं वास्‍तव में तो आपने तीन बड़े बड़े चित्र लगा दिये हैं । एक बड़ी सी परिचर्चा लगा दी है जिसमें छ: ऐसे लोगों के फोटो आपने छाप दिये हैं जिनको जल संकट के बारे में कोई तकनीकी ज्ञान नहीं है । शहर के पांच छ: व्‍यपारियों को छांट कर उनके नाम से सचित्र परचिर्चा लगा दी है । परिचर्चा का अर्थ होता है उस विषय का ज्ञान रखने वाले लोगों का विचार कि वे क्‍या सोचते हैं इस बारे में । मगर यहां तो पता नहीं क्‍या सोचा कर ये नाम छांटे गये हैं । एक लगभग छ: कालम का फोटो और दो अन्‍य फोटो एक बड़ी सी पांच कालम की परिचर्चा और बीच में एक छोटा सा समाचार, बन गया पेज । अगर ये नवदुनिया कर सकती है तो अब पता नहीं मुझे कौन सा समाचार पत्र ढूंढना होगा पढ़ने के लिये या हो सकता है कि अब समाचार पत्र पढ़ना ही बंद करना पड़े । परिचर्चा को जब तक पठनीय नहीं बनाया जाये तब तक परिचर्चा को केवल दो ही लोग पढ़ते हैं एक तो जिसका फोटो छपा है वो और दूसरा वो जिसने लिखी है । खैर जो भी हो मिथक टूटने के लिये ही बनते हैं और आज एक मिथक और दरक गया है ।

7 comments:

Vinay Chhajlani said...

pankaj jee:

I read through your post and appreciate your bringing out the fact that the Bhopal Navdunia coverage looks like a Table story. Certainly readers are no fools and it is the responsibility of every journalist to make sure that what you publish is fact, it is either reported or researched and that it has a value for the reader.

I will certainly discuss with the Navdunia team about this aspect.

Reader who is none other then an important citizen has a mind and we need to respect that.

दिगम्बर नासवा said...

पंकज जी

आप का लेख उचित है.
तकनीकी के युग ने तो हमें और पंगु बना दिया है. कट और पेस्ट का इस्तेमाल सब करने लगे हैं, कोई भी इस से अछूता नही है. सजग लेख की लिए धन्यवाद

Suresh Chiplunkar said...

सुबीर भाई, ये परिचर्चा और फ़ोटो वाली खुजली "दैनिक भास्कर" ने और अखबारों में फ़ैलाई है, भास्कर में इस प्रकार की एक फ़ड़तूस सी परिचर्चा रोज होती है, और मजे की बात तो यह कि उसमें छपने वाली प्रतिक्रियाएं रटी-रटाई होती हैं, लोगों को सिर्फ़ अपना फ़ोटो अखबार में देखने में मजा आ जाता है, भास्कर की जगह भर जाती है, और उसके ग्राहकों की संख्या बढ़ जाती है, भास्कर ने उज्जैन में "सण्डे भास्कर" के नाम से दो पेज का पुल-आऊट निकालना शुरु किया है, जिसमें बर्थ-डे पार्टी, किटी पार्टी, युवाओं के क्लबों की पार्टियों की गतिविधियों की जानकारी भी दे दी जाती है, यह है पत्रकारिता का गिरता स्तर… और इसकी देखादेखी अन्य अखबार भी ऐसा करने लगे हैं…

विष्णु बैरागी said...

समाचार-पत्र अपनी विश्‍वसनीयता और उपयोगिता क्‍यों खो रहे हैं, यह आपकी पोस्‍ट से उजागर होता है । ऐसी बातों से समाचार पत्र अन्‍तत: प्राणविहीन होकर रह जाएंगे ।
एक सूचना - मेरा ब्‍लाग देखिएगा । आपके ब्‍लाग को मेरे ब्‍लाग रोल में देखकर आपको शायद प्रसन्‍नता हो ।

Anil Pusadkar said...

नवदुनिया क्या और न्ईदुनिया क्या?पूरी दुनिया यही कर रही है.जागरण से आप अगर निराश है तो भास्कर से भी खुश नही रह सकते.सभी अपने प्रोडक्ट को बेचने मे लगे है,बस यही अँतिम उद्देश्य है पत्रकारिता का.आपसे पूरी तरह सहमत हूँ.

cmpershad said...

टेबल न्यूज़ बनाने में यह सुविधा होती है कि पत्रकार को कहीं जाना नहीं पडता - बस शर्त यह है कि उसका मस्तिष्क उपजाऊ हो।

harsh said...

subir ji ,
apki pratikriya dekh kr esaa lag raha hai ki app nai patrkarita ke gyan se parichit nahi hain kyunki nay yug mein photo patrkarita esa madhyam ban gaya hai ki photo khud hi samasya ko bayan krne lage hain.... aur navdunia pradesh ka pahla akhbar hai jo iss disha mein kadam bada raha hai...khali narbada ka chitr iss bat ko pradshit kr raha haiki pani ke bina kal kesa hoga.....

or apki jankari ke liye bata dun ki ek chines kahavat hai...

1000 words is equal to 1 picture

thank you