आइये आपको मिलाते हैं दैनिक विज्ञापन भास्‍कर से

दैनिक भास्‍कर को अब एक समाचार पत्र कहना मतलब ये कि अपनी ही बुद्धि का सार्वजनिक प्रदर्शन करना । दैनिक भास्‍कर अब केवल एक सूचना पत्र हो कर रह गया है जिसमें समाचारों के लिये कहीं कोई स्‍थान नहीं होता है । लेकिन आज तो मैं जिस विषय की बात करना चाह रहा हूं वो कुछ दूसरा ही है । दरअसल में दैनिक भास्‍कर का इन दिनों जो स्‍वरूप सामने आया है उसको देख कर ये लगता है कि क्‍या ये वास्‍तव में एक समाचार पत्र ही है । या फिर एक बड़ा सा यलो पेज है जिसमें यलो पेज के पाठकों के लिये बीच बीच में कुछ समाचार लगा दिये जाते हैं । ये समाचार उसी शैली में होते हैं जिस शैली में टीवी पर विज्ञापनों के बीच बीच में कहीं कहीं आपको कार्यक्रम भी देखने को मिल जाता है । लेकिन कहा जाता है ना कि जो बिकता है वो आलोचनाओं के परे होता है । फिर भी मैंने अपने शहर के हॉकरों और एजेंटों से जानने का प्रयास किया कि आखिर लोग दैनिक भास्‍कर क्‍यों खरीद रहे हैं । जबकि उसमें कुछ भी ऐसा नहीं है जो इतना आकर्षक हो कि उसका मोह किया जाये । पहले ये बानगी देखिये उसके बाद आपको बताऊंगा कि हॉकरों और एजेंटों का उत्‍तर क्‍या था । आज मेरे हाथ में जो दैनिक भास्‍कर आया है वो 12 पृष्‍ठों का है उन 12 पृष्‍ठों की बात हम करते हैं । एक पृष्‍ठ में आठ कालम होते हैं और एक कालम की चौड़ाई लगभग 4 सेंटीमीटर होती है । अर्थात लगभग 32 सेंटीमीटर की चौड़ाई समाचार पत्र की होती है । ऊंचाई लगभग 50 सेंटी मीटर होती है । अर्थात 1600 स्‍कवायर सेंटीमीटर की जगह अमूमन एक पृष्‍ठ में होती है । 12 पृष्‍ठ अर्थात 19200 स्‍क्‍वायर सेंटीमीटर जगह कुल मिलाकर । मेरे हाथ में जो पेपर है उसमें पेज एक पर 480 स्‍क.सेमी के विज्ञापन हैं । पेज 2 पर 800, पेज तीन पर 1100, पेज चार पर संपादकीय होने के कारण विज्ञापन नहीं हैं, पेज पांच पर 800, पेज छ: पर 800, पेज सात पर 800, पेज आठ पर 1600, पेज नौ पर 640, पेज दस पर खेल पृष्‍ठ, पेज ग्‍यारह पर 300 और पेज बारह पर 1600 स्‍क्‍वायर सेमी विज्ञापन हैं अर्थात 19200 में से लगभग नौ हजार स्‍क्‍वायर सेमी के विज्ञापन हैं । इसके अलावा लगभग 1000 स्‍क सेमी जगह में पेज का मत्‍था वगैरह है । मतलब कि पाठक को पढ़ने के लिये मिला केवल नौ हजार सेमी । उसमें से भी बड़े बड़े चित्रों का हिस्‍सा 4000 सेमी निकाल दें तो बचता है केवल 5000 सेमी । तो भैया पाठक ये है तुम्‍हारे लिये जाओ पढ़ो और ऐश करों

अब सुनिये क्‍या कहा हॉकरों ने उनका कहना था कि दैनिक भास्‍कर को जो भी पाठक ले रहे हैं वे अपनी बीबी, बच्‍चों से मजबूर होकर ले रहे हैं । क्‍योंकि भास्‍कर के साथ आने वाली पत्रिकायें मधुरिमा, नवरंग, रसरंग और बालरंग इस वर्ग में लोकप्रिय हैं । हॉकरों का कहना है कि केवल इनके कारण ही पेपर चल रहा है । इसे कहते हैं कि मूल रह गया पीछे और ब्‍याज चल रहा आगे ।

खैर कल के पोस्‍ट पर नईदुनिया ग्रुप के मालिकों में से एक श्री विनय छजलानी जी का कमेंट प्राप्‍त हुआ है । जानकर अच्‍छा लगा कि आज भी ऐसे लोग हैं जो आलोचना और निंदा के बीच के अंतर को पहचानते हैं । चलिये मिलते हैं कल किसी और विषय के साथ । 

3 comments:

संगीता पुरी said...

रोचक जानकारी दी है आपने...भास्‍कर के साथ आने वाली पत्रिकायें मधुरिमा, नवरंग, रसरंग और बालरंग के कारण ही पेपर चल रहा है । और आज के व्‍यावसायिक युग में जब पेपर चल ही रहा है तो क्‍या फर्क पडता है। सही कहा मूल धन से सूद प्‍यारा होता है।

नीरज गोस्वामी said...

जयपुर में भास्कर खूब तामझाम से शुरू हुआ था और लोकप्रिय भी तुंरत हो गया ये सब इसलिए हुआ क्यूँ की उस समय राजस्थान में पत्रिका का बोलबाला था और लोग बेसब्री से उसकी टक्कर के अखबार का इन्तेजार कर रहे थे...नवभारत आया लेकिन चला नहीं बाकि के अखबार नवज्योति या राष्ट्रदूत बहुत पीछे थे...ऐसे समय में भास्कर ने पत्रिका के गढ़ को ध्वस्त किया...और खूब किया...सबसे पहले कीमतें घटा कर और फ़िर नानाविध प्रकार की मनोरंजक संस्करण निकाल कर..लेकिन अब भास्कर जब स्थापित हो गया है तो वो ही सबकुछ कर रहा है जो आपने लिखा है...ऐसे ही होता है भाई...चाहे वो इलेक्शन हो या अखबार का प्रकाशन...बड़े बड़े वादे और फ़िर टाँय टाँय फिस्स...चार दिन की चाँदनी और फ़िर अँधेरी रात वाली बात...
नीरज

हिमांशु said...

यह हाल तो लगभग सभी अखबारों का है, कहीं थोड़ा कम, कहीं थोड़ा ज्यादा.