आइये आपको सैर करवाते हैं एक अनोखे मेले की जी हां ये है 'भूतों का मेला' एक मेला जहां पर पितृमोक्ष अमावस की रात को आते हैं भूत और भूतों के विशेषज्ञ

भारत एक विचित्रताओं से भरा हुआ देश है यहां के रीत रिवाज़ परंपराएं और त्‍यौहार शायद विश्‍व में सबसे अनूठे होते हैं । कुछ लोग अंधविश्‍वास कहते हैं तो कुछ इनको ढोंग धतूरे भी कहते हैं मगर फिर भी ये परंपराएं वर्षों से चली आ रही हैं और बिना किसी परिवर्तन के चली आ रही है । अब जैसे मध्‍य प्रदेश के सीहोर जिले में पितृमोक्ष अमावस्‍या को लगने वाले भूतों के मेले की ही बात करें तो ये अपने आप में ही अनोखा मेला है जहां पर केवल भूत और उनके विशेष्‍ज्ञ ही आते हैं और ये मेला भी सबसे बड़ी अमावस्‍या पितृमोक्ष अमावस को लगता है और शायद इस मामले में भी अनूठा है कि ये अपने आप में एक ही मेला है जो आधी रात को शुरू होता है और सुबह होने के पहले खत्‍म हो जाता है । सही भी तो है अगर मेला भूतों का हो तो उसे दिन में लगाया भी कैसे जा सकता है । वो तो रात में ही लगेगा ।

ये मेला जिस जगह पर लगता है वो जगह ही अपने आप में कम सुंदर नहीं है दरअस्‍ल में सीहोर जिले के नादान के पास स्थित कालियादेव स्‍थान पर ये मेला लगाया जाता है । ये स्‍थान काफी सुरम्‍य है । यहां पर सीप नदी चट्टानों के बीच से झरने का रूप लेकर एक गहरे कुंड में गिरती है ऊपर से गिरती हुई सीप नदी का शोर और उस पर भूतों का मेला वाह क्‍या बात है । कुंड का गहरा हरा पानी उसकी गहराई का कुछ कुछ आभास देता है । इस कुंड के बारे में भी कई सारी बातें प्रचलित हैं कुछ लोग कहते हैं कि इस कुंड की गहराई का कोई छोर नहीं मिलता है।  यहीं पर पास की पहाड़ी पर एक गांव के अवशेष भी मिलते हैं तथा ये पुराने गांव मंडलगढ़ के अवशेष हैं जो प्रचलित मान्‍यताओं के अनुसार रूपमती ( एतिहासिक पात्र बाज बहादुर और रूपमती )  के ननि‍हाल के अवशेष हैं । कहा ये भी जाता है कि जब बाज बहादुर का पड़ाव यहां पर डला हुआ था तब ननि‍हाल आई रूपमती को पहली बार बाज बहादुर ने यहीं पर देखा था ।

अब बात करें भूतों के मेले की दरअसल में इसको भूतों का मेला इसलिये कहा जाता है कि यहां पर पितृमोक्ष अमावस की रात को वो सारे लोग बड़ी संख्‍या में पहुंचते हैं जिनको प्रेतबाधा की शिकायत होती है । और साथ में ही पहुंचते हैं प्रेत उतारने वाले विशेषज्ञ और रात भर प्रेतों की पेशियां होती हैं विशेषज्ञों के सामने बहस होती हैं और फिर निर्णय होते हैं इसी बीच बड़ी संख्‍या में आए हुए लोगों के कारण इस स्‍थान पर एक मेला भी रूप ले लेता है जिसको कहा जाता है भूतों का मेला । वो मेला जहां पर भूत आते हैं । सुबह होने से पहले ही ये मेला खत्‍म हो जाता है और सारे भूत अपने घरों को लौट जाते हैं । कुछ को प्रेत बाधा से मुक्ति मिल जाती है तो कुछ वैसे ही चले जाते हैं । सारी रात यहां पर ग़ज़ब का ड्रामा होता है भूतों की बहस उनको प्रसन्‍न करने के लिये मदिरा और अन्‍य चीजों का चढ़ावा विशेषज्ञों की कोशिशें । इन सब को दम साध कर देखते हैं वे लोग जो भूतों के साथ आए होते हैं । सारी रात का ड्रामा सुबह होने से पहले ही समाप्‍त हो जाता है और सुबह केवल रात के मेले के अवशेष ही रह जाते हैं । तो अगर आप को भी देखना हो ये अनूठा भूतों को मेला तो पांच दिन बाद पड़ रही पितृमोक्ष अमावस को चले आइये मध्‍य प्रदेश के सीहोर जिले के कालियादेव में । ( ये लेख अंधविश्‍वास को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से नहीं बल्कि केवल सूचनाप्रद पत्रकारिता के उद्देश्‍य से लिखा गया है लेखक की सहमति इस तरह के आयोजनों के साथ नहीं है )

1 comments:

Sanjeeva Tiwari said...

सराहनीय प्रयास, हम सभी अपने अपने क्षेत्र की ऐसी जानकाररियों को इस माध्‍यम से एक दूसरे को शेयर करें तो हमारे भारत की विविधता से परिचित हो पायेंगें । घन्‍यवाद ।

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