अगर हिन्‍दू भाई हमारे लिये रोज़ा अफ़्तार रख सकते हैं तो हम नवरात्रि में साबूदाने की खिचड़ी क्‍यों नहीं बांट सकते मंदिर के सामने

ऊपर लिखा गया एक वाक्‍य ही वो वाक्‍य है जिसमें भारत की खुशहाली का सारा राज़ छुपा है । और ये वाक्‍य कह रहे हैं दो मुस्लिम मेहबूब और इशाक । ये बात दरअस्‍ल में वो बात है जो भारत की आत्‍मा की आवाज़ है और ये बात अगर गूंज बन कर पूरे भारत की हवाओं में फैल जाए तो फिर भारत को दुनिया का सरताज बनने से कोई भी नहीं रोक सकता ।

मध्‍य प्रदेश का एक सुप्रसिद्ध देवी मंदिर सलकनपुर में है । यहां पर पहाड़ की ऊंची टेकरी पर बीजासन देवी की पिंडी है और हजारों की संख्‍या में श्रद्धालू यहां पर दर्शनों के लिये देश भर से आते हैं विशेषकर नवरात्रि में तो ये संख्‍या काफी बढ़ जाती है । ऊंची पहाड़ी पर चढ़ने के लिये सीढि़यां बनाई गई हैं और ऊपर तक पहुचते पहुचते हालत खराब हो जाती है । मध्‍य प्रदेश के सीहोर जिले में स्थित ये मंदिर राजधानी भोपाल से 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । इस बार यहां पर आने वाले श्रद्धालुओं को फलाहार तथा चाय पान की मुफ्त व्‍यवस्‍था कराने का जिम्‍मा दो मुस्लिम युवकों ने उठा कर रखा है । मेहबूब और इशाक देवी मंदिर के रास्‍ते में पंडाल लगा कर बैठे हैं और रास्‍ते में खड़े होरक श्रद्धालुओं को बुला बुला कर अपने पंडाल में ले जाकर साबूदाने की खिचड़ी तथा अन्‍य फलाहार करवा रहे हैं । नवरात्रि पर सलकनपुर आने वाले श्रद्धालुओं के लिये यूं तो रास्‍ते भर में कई सारी संस्‍थाओं ने फलाहार तथा चाय पान की व्‍यवस्‍था कर रखी है पर उसमें से ये पंडाल विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है जहां पर ये दोनों मुस्लिम भाई अपना पंडाल लगा कर सेवाएं दे रहे हैं । इन दोनों से बात करने पर उन्‍होंने बहुत ही सीधे साधे से लहज़े में एक ही बात कही वो बात जो कानों से होकर सीधे दिल में उतर जाती है । इनका कहना है कि जब हमारे हिंदू भाई रमज़ान के महीने में देश में स्‍थान स्‍थान पर रोज़ा अफ़्तार का आयोजन रखते हैं तो फिर क्‍या हम नवरात्रि में मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं के लिये साबूदाने की खिचड़ी का फलाहार भी नहीं करवा सकते । एक दूसरे के त्‍यौहारों में शामिल होने से भाई चारा बढ़ता है और ये ही वो बात है जो फिरकापरस्‍ती फैलाने वालों पर आखिरकार भारी पड़ेगी । पता नहीं मेहबूब और इशाक का पैगामे मोहब्‍बत कहां तक पहुचता है और कुछ असर भी करता है या नहीं पर ये तो सच है कि अगर देश के सारे लोग इन दोनों की तरह से सोचने लगें तो शायद बहुत कुछ अपने आप ही सुधर जाएगा । ' मेरा पैग़ाम मोहब्‍बत है जहां तक पहुंचे''

3 comments:

मीनाक्षी said...

ऐसी बातें पढ़कर मन मे आशा जाग जाती है कि कयामत आने में अभी देर है. अभी भी मानवता का सुन्दर रूप कहीं कहीं दिखाई दे जाए तो मन खुशी से झूम उठता है.

Udan Tashtari said...

आपने बिल्कुल सत्य कहा. ऐसे ही लिखते रहे, निश्चित अलख जागेगी एक दिन. बहुत अच्छा लगा देवी मंदिर की यह प्रथा जानकर. आप सिहोर के बारे में इतना कुछ लिखते हैं, इन्हें विकि पिडिया पर भी ले जायें.

Shrish said...

वाकई दोनों भाइयों का कार्य प्रशंसा योग्य है। सभी को इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। असामाजिक तत्वों को भी यह कदम संकेत देता है कि वे अपने नापाक इरादों में कभी कामयाब नहीं होंगे।